लोटा

आइए जरा याद कर लें एक विलुप्त होती हुई 'प्रजाति' को 

लोटा.....

लोटा एक साधारण सा शब्द लेकिन इसकी महिमा निराली .........बिहार की संस्कृति व गँवई जीवन से जुड़ा हुआ...... एक समय था जब इसके बिना काम चलना-चलाना बहुत ही कठिन था........लोटे से  अनेकों  जनोक्तियों की उत्पत्ति भी हुई फिर भी आज लोटा उपेक्षित ,विलुप्त होने की कगार पर है .... लोटे के लुढ़कने से ही लोटना शब्द का भी निर्माण हुआ होगा...........मनुष्य जब पी कर मदमस्त हो जाता है तो कहीं पर भी लोट जाता है........चाहे वह सड़क, घुरा या नाली ही क्यों ना हो....बच्चा जब किसी चीज के लिए जिद करता है तो वह भी धरती पर लोटने लगता है....अगर किसी को किसी से इर्ष्या है तो साँप भी लोटने लग जाता है छाती पर....अगर आदमी ना होकर गधा है तो वह भी नहलाने - धुलाने के बाद धुल में लोटता है....भैंस को कितना भी साफ पानी से धो लीजिये लेकिन मौका मिलते ही कीचड़ में जरुर लोटेगी ,उसे कीचड़ में लोटने से अपूर्व आनंद की अनुभूति होती है........लोटे और लोटने से जुड़ी अनुभूति ही अनूठी ....

एक मुहावरा भी है कि 'लोटा लेकर आए थे और बहुत कमा लिए' .... लोटा की महिमा ही निराली थी.. बिना लोटा के किसी का काम ही नहीं चलता था ....सुबह उठ कर सीधा लोटा ही याद आता था....अगर कोई एक मिनट रुकने के लिए कह दे तो रुका नहीं जा सकता था क्योंकि हाथ में लोटा था...'उसे' फिर लौटाया नहीं जा सकता था इस लिए लोटा लेकर भागना ही पड़ता था....लोटा 'इज्जत-सेविंग डिवाइस' था...पहले के ज़माने में आदमी अगर कहीं किसी गांव में जाता था तो लोटा साथ ही रख कर ले जाता था...अगर पानी पीना है, नहाना है, कुछ गरम कर के पीना है तो लोटा ही काम आता था.....अगर यात्रा में कहीं पर रूपये पैसे ख़त्म हो गए या चोरी हो गए तो लोटे को बेच कर अपने वापसी के लिए या भोजन के लिए रूपए - पैसे जुटाए जाते थे..... यात्रा में लोटा ही तो साथ निभाता था ....

लोटे में अतिथियों को पानी देना शुभ माना जाता था......आव - भगत का यह आवश्यक अंग था....घर में जब कथा- पूजा होती थी तो लोटा कलश के काम आता था....उसमे जल भरकर आम की पॉँच पत्तियां लगा कर मंगल - कलश का रूप दिया जाता था तथा उसका पूजन होता था....... इस तरह हरेक मंगल कार्य की शुरुवात लोटे से ही होती थी ...... 

लोटा से क्रोध भी प्रदर्शित किया जाता था....अगर गुस्सा आ गया तो लोटा फेंक कर मारा भी जाता था........यह किसी का सर भी फोड़ सकता था....यह किसी बम से कम काम नहीं करता था........अगर इसको फेंकने वाला कोई बलशाली हुआ तो बस समझ लिजिए यह मिसाईल था..... सीधा निशाने पर ही लगता था....

लोटा जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के काम आता था और मनुष्य के साथ अंत तक जुड़ा रहता था... पूजा - पाठ एवं विवाह से लेकर अंतिम संस्कार तक काम आता था ....विवाहादि में कांसे का लोटा - गिलास और कांसे की थाली लड़की को देने का रिवाज था.... 

अब बात आती है लोटे के पेंदे की ....तो लोग पेंदा वाला लोटा ही लेना ज्यादा पसंद करते थे क्योंकि लुढ़कता नहीं था और उसमे रखी वस्तु गिरती नहीं थी, बरबाद नहीं होती थी.....इसी से कहावत भी बना 'बिन पेंदे का लोटा'....अब यहाँ पर लोटा मनुष्यों पर सवार हो गया....बिन पेंदे का लोटा कहने से समझ में आ जाता है कि अमुक व्यक्ति विश्वसनीय नहीं है.....यह कहीं पर भी आपको धोखा दे सकता है...आपकी बनी बनाई 'खीर' बिखेर सकता है....'रायता' भी फैला सकता है इसलिए इससे दूर रहा जाए....शायद इसीलिए लोटा बनाने वाले इसमें पेंदा लगना नहीं भूलते थे .....!!

पहले ग्रामीणों घरों में इस्तरी ( स्टीम आयरन) नहीं होती थी ...कपड़ों को पहनने लायक बनाने में भी लोटा ही काम आता था....मोटे पेंदे के लोटे में गरम कोयले को भर कर कपड़ों की सलवटें दूर की जाती थीं और व्यक्ति मजे से 'बाबु साहब' बनकर विशेष अवसरों पर सज जाता था......पहले इसे कपड़ों पर 'लोटा करना' कहते होंगे जिसे आज प्रेस करना या इस्तरी करना कहते हैं....!! सच में यह लोटा बड़े काम की चीज था.....

भला हो लोटे का जो जीवनपर्यंत कभी साथ नहीं छोड़ता था.....बच्चा पैदा होता था तो उसको प्रथम स्नान लोटे से ही कराया जाता था और मनुष्य के अंतिम संस्कार के समय लोटे में ही घी डाल कर कपाल क्रिया संपन्न करायी जाती थी.....इसी तरह लोटा जन्म से मृत्यु तक साथ निभाता था.......बड़े-बुजुर्ग ठीक ही कहते हैं "लोटे का कर्ज कभी लौटाया नहीं जा सकता ... इसकी महिमा ही अपार थी...लेकिन अब ना लोटा है ना इसका अफ़साना ; याद आ गया वो गुजरा जमाना ..."

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